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Saturday, September 30, 2017

दशहरा, देखने के लिए उमड़ती है 6 लाख लोगों की भीड़ इतना भव्य है यहां का दशहरा

मैसूर (कर्नाटक). बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर भारत में दशहरा को धूमधाम से मनाया जाता है। एक शहर ऐसा है जहां दशहरा उत्सव देखने दुनियाभर से लोग आते हैं। कर्नाटक के मैसूर में दशहरे को मनाने की एक अलग तरीके की परंपरा है। यहां पर इसको 'कर्नाटक का नाडा हब्‍बा' कहते हैं। तकरीबन 500 साल पुरानी परंपरा के अनुसार यहां के राजा नवरात्रों में नौ दिनों तक दरबार लगाते हैं। इन दिनों मैसूर के राजा यदुवीर हैं।

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- रीति-रिवाज को निभाते हुए राजा यदुवीर दशहरे के दिन हाथी की सवारी करके नगर भ्रमण पर निकले हैं।
- इस जंबू सवारी को देखने के लिए हर साल करीब 6 लाख लोग मैसूर पहुंचते हैं।
- माना जाता है कि 15वीं सदी में विजयनगर साम्राज्‍य के राजाओं ने इस पर्व को कर्नाटक में शुरू किया था।
- 14वीं सदी में इसकी ऐतिहासिक भूमिका थी और उस वक्‍त हम्‍पी नगर में इसको महानवमी कहा जाता था।
- इस साम्राज्‍य के पतन के बाद मैसूर के वाडयार राजाओं ने महानवमी (दशहरा) मनाने की परंपरा को जारी रखा।
- कृष्‍णराज वाडयार तृतीय ने मैसूर पैलेस में विशेष दरबार लगाने की परंपरा शुरू की थी।
- दिसंबर, 2013 में श्रीकांतदत्‍ता वाडयार की मृत्‍यु के बाद इस परंपरा को उनके वारिस यदुवीर कृष्‍णदत्‍ता वाडयार आगे बढ़ा रहे हैं।

खास मैसूर का दशहरा
- दशहरे पर मैसूर के राजमहल में खास लाइटिंग होती है। सोने-चांदी से सजे हाथियों का काफिला 21 तोपों की सलामी के बाद मैसूर राजमहल से निकलता है।
- काफिले की अगुआई करने वाले हाथी की पीठ पर 750 किलो शुद्ध सोने का अम्बारी (सिंहासन) होता है, जिसमें माता चामुंडेश्वरी की मूर्ति रखी होती है। जो करीब 6 किमी दूर बन्नी मंडप में खत्म होता है जहां माता की पूजा की जाती है।
- पहले इस अम्बारी पर मैसूर के राजा बैठते थे, लेकिन 26वें संविधान संशोधन के बाद 1971 में राजशाही खत्म हो गई। तब से अम्बारी पर राजा की जगह माता चामुंडेश्वरी देवी की मूर्ति रखी गई।
रावण का पुतला नहीं जलाया जाता


- खासकर साल 1972 के बाद से इस रिवाज में थोड़ा बदलाव आ गया है। जब से सरकार ने इस दशहरे के आयोजन का जिम्मा खुद लिया तब से राजपरिवार अपने महल में शाही अंदाज में दशहरा मनाता है जबकि बाहर राज्य सरकार बाहर का जिम्मा उठाती है।


- इस दशहरे की खासियत यह है कि यहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता और न ही राम को पूजा जाता है, बल्कि यहां दशहरे का पर्व इसलिए मनाया जाता है क्योंकि चामुंडेश्वरी देवी ने राक्षस महिषासुर का वध किया था।

Friday, September 29, 2017

लावारिस अटैची से सहमा बनारस. जाँच में मिला कपडा और कागजात

वाराणसी.काशी के धरती को दहशत से भरने का एक नाकाम प्रयास आज शुक्रवार को दोपहर में हुआ जब शहर के अतिव्यस्त सिगरा स्थित आईपी माल के पास दो लावारिस अवस्था में अटैची बरामद हुई. लावारिस अटैची की बात शहर में फैलते ही लोगो का मौके पर पहुचने का क्रम शुरू हो गया है.



लावारिस अटैची की जानकारी आते ही प्रशासन तत्काल हरकत में आया और सड़क पर आवागमन दोनों तरफ से बंद कर दिया है, समाचार लिखे जाने तक अटैची की जाँच चल रही है, मौके पर भारी पुलिस बल के साथ उच्चाधिकारी पहुचे और किसी अप्रिय घटना से निपटने के लिये बम निरोधक दस्ता भी मौके पर बुला लिया गया.  और शुरू हुई अटैची की छानबीन, सिगरा थाना प्रभारी गोपाल जी गुप्ता को एक नहीं बल्कि मौके पर दो टेंशन बर्दाश्त करना पड़ा एक लावारिस अटैची की छानबीन और दूसरा तमाशबीन बनी भीड़ को नियंत्रण में करना. प्रशासन किसी तरह का कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं था और अटैची की गहनता से जांच किया गया तो किसी प्रकार के बम अथवा अन्य विस्फोटक का सुराग नहीं मिलने के बाद अटैची को खोला गया. इस अटैची को खोलने के बाद मालूम चला की अटैची में केवल कुछ कपडे और कागजात ही बरामद हुवे. लावारिस अटैची में मिले कागज़ातो के आधार पर ज्ञात हुआ कि उक्त अटैची गोंडा की रहने वाली किसी उर्मिला सिंह की है. पुलिस मौके पर स्थिति सामान्य कर आवागमन शुरू कर चुकी है और अभी तक तमाशबीन बनकर खडी जनता  भी अब अपने काम पर जा चुकी है, क्षेत्र में शांति का माहोल है और पुलिस अटैची के सम्बन्ध में उर्मिला सिंह से अब संपर्क स्थापित करने का प्रयास कर रही है.

Wednesday, December 14, 2016

चाणक्य नीति: सुखमय जीवन व्यतीत करना है तो भूलकर भी न करे इन 5 पर विश्वास

आचार्य चाणक्य ने बहुत सारी नीतियों का उल्लेख किया है। जिन पर अमल करके व्यक्ति खुशहाल जीवन यापन कर सकता है। सामान्यत: व्यक्ति का जीवन विश्वास पर चलता है। व्यक्ति अपने आस-पास रहने वाले लोगों अौर जीवों पर विश्वास रखता है। लेकिन आचार्य चाणक्य ने ऐसे लोगों के बारे में बताया है जिन पर भरोसा करके व्यक्ति का जीवन सुखमय बना रह सकता है।

आचार्य चाणक्य कहते हैं-
नदीनां शस्त्रपाणीनां नखीनां श्रृंगीणां तथा।
विश्वासो नैव कर्तव्य: स्त्रीषु राजकुलेषु च।।

* इस श्लोक में चाणक्य ने बताया है कि व्यक्ति को किन-किन पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

* चाणक्य के अनुसार नदियों के पुल पर भरोसा नहीं रखना चाहिए। जिन नदियों के पुल कच्चे होते हैं उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। कोई नहीं जान सकता कि नदी का बहाब कब तेज हो जाए।

* शस्त्रधारियों पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता।

* जिन जीवों के नाखुन और सींग नुकीले होते हैं। उन पर विशवास करने वालों को कष्ट का सामना करना पड़ता है। कब उनकी जान जोखिम में पड़ जाए कोई नहीं जान सकता क्योंकि वे कब बिगड़ जाए और नाखुन या सींगों से प्रहार कर दें।

* चंचल स्वभाव की स्त्रियां भी विश्वास योग्य नहीं होती। इसके साथ ही जिन लोगों का संबंध शासन से है उन पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए। इन सभी पर भरोसा करना नुक्सानदायक हो सकता है। इस प्रकार के लोग अपने स्वार्थ के लिए किसी को भी धोखा दे सकता है।